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जीवन परिचय

Dayanand Saraswati Biography In Hindi: दयानंद सरस्वती का सम्पूर्ण जीवन परिचय

Dayanand Saraswati Biography In Hindi

यदि हमें जीवन में कुछ भी काम करना है और जीवन में सफलता प्राप्त करना है, तब हमें शिक्षा तथा संस्कारों के आधार को मजबूत रखना चाहिए। क्योकि यदि हमारी शिक्षा में कमी रह जाए जाएगी। तब हम जीवन में सही फैसले करने में असमर्थ हो जायेंगे और यदि हमारे जीवन में हमें सही संस्कारों की प्राप्ति नही हो तब हम भले ही अपनी लाइफ में कितना भी सफल हो जाए और धन कमा ले।

लेकिन हम अच्छे संस्कारों की अनुपस्थिति के कारण गलत मार्गो पर चलकर अपनी सफलता, धन तथा मान सम्मान को कुछ ही समय में नष्ट कर देंगे। यही कारण है की हमारे जीवन में एक अच्छे और प्रभावी गुरु का कितना अधिक महत्त्व हो जाता है।

क्योकि किसी भी व्यक्ति के जीवन में सही गुरु तथा मार्गदर्शक वही होता है। जिसने सभी सांसारिक अनुभव प्राप्त कर लिए है, जिससे की वो हमें अपने जीवन में आगे बढ़ने के लिए सही दिशा प्रदान करे। इस आर्टिकल स्वामी दयानंद सरस्वती जी के जीवन के बारे में जानेंगे जो एक महापुरुष होने के साथ साथ श्रेष्ठ गुरु भी है।

आज के इस आर्टिकल में हम Swami Dayanand Saraswati Biography In Hindi में जानेंगे तथा स्वामी दयानंद सरस्वती जी का सम्पूर्ण जीवन परिचय भी आपसे कराएँगे। हम आशा करते है की आपको स्वामी दयानंद सरस्वती जी की बायोग्राफी तथा स्वामी दयानंद सरस्वती जी का जीवन परिचय अवश्य ही पसंद आएगा। स्वामी दयानंद सरस्वती जी आर्य समाज के संस्थापक के रूप में पूजनीय व्यक्ति थे।

स्वामी दयानंद सरस्वती जी का बचपन:

आर्य समाज के संस्थापक के रूप में पूजनीय तथा प्रसिद्द स्वामी दयानंद सरस्वती का जन्म 12 फरवरी, 1824 को फाल्गुन कृष्ण दशमी तिथि को गुजरात के टंकारा नामक स्थान पर हुआ था। दयानंद सरस्वती जी का असली ( मूल ) नाम मूलशंकर अम्बाशंकर तिवारी था।

आपके पिता चूँकि एक कर कलेक्टर के रूप में काम करते थे, इसलिए दयानंद सरस्वती जी का परिवार आर्थिक रूप से समृद्ध था। दयानंद सरस्वती जी बचपन से ही आज्ञाकारी थे, दयानंद सरस्वती जी का परिवार ब्रम्हाण समाज से था। महर्षि दयानंद सरस्वती जी का प्रारंभिक जीवन पड़े ही सुविधापूर्ण माहौल में बिता था।

स्वामी दयानंद सरस्वती जी का शुरूआती जीवन:

चूँकि उनका जन्म एक ब्राम्हण परिवार में हुआ था तथा दयानंद सरस्वती जी के पिता उस समय के कर कलेक्टर के रूप में कार्यरत थे। इसलिए प्रारंभिक जीवन से ही दयानंद सरस्वती जी पारिवारिक तथा आर्थिक रूप से समृद्ध थे। उनका परिवार आर्थिक रूप से समृद्ध परिवार था, चूँकि दयानंद सरस्वती जी का परिवार ब्राम्हण समाज से ताल्लुक रखता था। इसलिए दयानंद सरस्वती जी ने भी पंडित बनने के लिए आगे चलकर संस्कृत, वेद पुराण तथा शास्त्रों का ज्ञान लिया और इन्ही के साथ साथ स्वामी दयानंद सरस्वती जी ने कई तरह की धर्मिक किताबो को पढ़ा था। दयानंद सरस्वती जी ने अपने जीवन कुछ वर्ष बहुत सी धार्मिक किताबो को पढने तथा उनके अध्ययन में बिताये थे।

शुरुआत से ही दयानंद सरस्वती जी के जीवन में बहुत सी घटनाए घटित हुई। इन एक के बाद एक घटित हो रही घटनाओं ने दयानंद सरस्वती जी को हिंदी धर्म की पारम्परिक मान्यताओ, रीति रिवाजो तथा भगवान् के बारे में गंभीर प्रश्न पूछने पर विवश कर दिया था। यह उस समय की बात है जब स्वामी दयानंद सरस्वती जी एक बालक की अवस्था में ही अपना जीवन व्यतीत कर रहे थे।

दयानंद सरस्वती जी के जीवन बदल देने वाली घटना:

यह घटना उस समय की है जब दयानंद सरस्वती जी तब वे एक बालक की अवस्था में ही थे। जिस समय यह घटना दयानंद सरस्वती जी के जीवन में घटित हुई उस दिन शिवरात्रि का पावन दिन था। उस समय शिवरात्रि के दिन दयानंद सरस्वती जी का पूरा परिवार पास ही के एक मंदिर में जागरण के लिए गया हुआ था। जागरण करते हुए दयानंद सरस्वती जी का पूरा परिवार सो गया था। परन्तु दयानंद सरस्वती जी पूरी रात जागते रहे और इस बात के इंतज़ार में थे की जो भोग सभी ने मिलकर भगवान् शिव को चढ़ाया है, उसे ग्रहण करने के लिए भगवान् शिव अवश्य ही आयेंगे।

परन्तु उस रात दयानंद सरस्वती जी की सोच से बिलकुल विपरीत हुआ था। जिब भोग को उन्होंने भगवान् शिव को चढ़ाया था, उस भोग को चूहे कहा रहे थे। इस दृश्य देखकर दयानंद सरस्वती जी आश्चर्यचकित रह गये थे। उन्हें यह नही समझ आ रहा था की भला उन्होंने तो उस भोग को भगवान शिव को अर्पण किया था। लेकिन उनके भोग को तो चूहे बड़े मजे से कहा रहे है।

इस बात से दयानंद सरस्वती जी ने यह तर्क दिया की जो भगवान् स्वयम अपने प्रसाद की रक्षा नही कर सकते है वो हमारी और हमारे मानव समाज की रक्षा भला कैसे करेंगे। इसलिए दयानंद सरस्वती जी ने यह तर्क दिया की हमें इस प्रकार के असहाय ईश्वर और भगवानो की उपासना और भक्ति नही करनी चाहिए। इस असमंजस से भरी हुई घटना के कारण दयानंद सरस्वती जी बहुत अधिक प्रभावित हुए थे।

स्वामी दयानंद सरस्वती जी का खोज में निकलना:

शिवरात्रि के दिन हुई उस घटना के कारण महर्षि दयानंद सरस्वती जी का मन बहुत सारे सवालों से भर गया था। अब उन्हें केवल सत्य की ही तलाश रहती थी। की आखिर हम जिनकी भी पूजा तथा उपासना करते है और जिन भी धार्मिक परम्पराओ को मानते है उसके पीछे का क्या तर्क और सच्चाई है। इसके बाद उनके जीवन में एक और घटना हुए जिसने उन्हें सत्य की खोज में निकलने पर विवश कर दिया था।

इसके बाद ही दयानंद सरस्वती जी की छोटी बहन तथा चाचा की हैजे की बीमारी के कारण मृत्यु हो गयी थी। तभी दयानंद सरस्वती जी जीवन मृत्यु के अर्थ के बारे में गहराई से सोच विचार करने लगे थे। दयानंद सरस्वती जी ने इस बारे में बहुत ही गहराई से सोचा और कई तरह के प्रश्न अपने माता पिता से करने लगे थे। जिस कारण से दयानंद सरस्वती जी के माता पिता भी बहुत चिंतित रहने लगे थे।

इसलिए दयानंद सरस्वती जी के माता पिता ने यह फैसला किया की यदि हम दयानंद सरस्वती का विवाह कर दे तब शायद जीवन की व्यस्तता के कारण वो इस तरह के प्रश्न करना छोड़ दे। लेकिन दयानंद सरस्वती जी ने निश्चय विवाह जैसी कोई चीज़ उनके लिए नही बनी है और उन्होंने विवाह को व्यर्थ बताते हुए। अपने सत्य की खोज करना ही उचित समझा इसके बाद साल 1846 में दयानंद सरस्वती जी सत्य की खोज में अपना घर छोड़कर निकल पड़े।

शिवरात्रि के दिन की उस घटना के बाद महर्षि दयानंद सरस्वती जी के जीवन में नया मोड़ आया था। वे अपने घर को छोड़कर निकल पड़े तथा यात्रा करते हुए गुरु विरजानंद के पास पहुंचे थे। उनके गुरु ने महर्षि दयानंद सरस्वती जी को पाणिनी व्याकरण, पातंजल योगसूत्र तथा वेग वेदांग इत्यादि का अध्ययन कराया था। अपने अध्यनन के पश्चात् उनके गुरु ने उनसे उनकी गुरु दक्षिणा के रूप में यह मागा की तुम मेरे द्वारा दी गयी शिक्षा को समाज में सफल करके दिखा सको और समाज में परोपकार की भावना को जागृत करो तथा समाज में फैले हुई अंधकार को दूर करो। महर्षि दयानंद सरस्वती जी के गुरु ने उनसे इस प्रकार से अपनी गुरु दक्षिणा मांगी थी।

ज्ञान प्राप्ति के पश्चात्:

अपने जीवन में महर्षि दयानंद सरस्वती जी ने सत्य की खोज समूचे राष्ट्र में अनेको स्थानों का भ्रमण किया था। उन्होंने कुम्भ पर्व के अवसर पर हरिद्वार पाखण्ड खंडिनी पताका भी फहराई थी. इसके बाद महर्षि दयानंद सरस्वती जी कोलकाता में बाबू केशवचन्द्र तथा देवेन्द्र नाथ ठाकुर के संपर्क में आये। इसके बाद ही महर्षि दयानंद सरस्वती जी ने पूरे कपडे पहनना तथा हिंदी में बोलना व लिखना शुरू किया था। कोलकाता में ही महर्षि दयानंद सरस्वती जी ने उस समय के तत्कालीन वायसराय को यह कहा था की ” में चाहता हूँ की विदेशियों का राज्य भी पूर्ण सुखदायक नही है।

सत्य की खोज में निकले महर्षि दयानंद सरस्वती जी ने बहुत सी जगहों पर यात्राए भी की तथा अनेको तरह की धार्मिक किताबो का अध्ययन भी किया था। महर्षि दयानंद सरस्वती जी का मानना था की अलग अलग भाषाए तथा विभिन्न प्रकार की शिक्षा के साथ अलग तरह के व्यवहारों का छुटना मुश्किल के साथ अति दुष्कर हो जाता है।  क्योकि इसके छुटे बगैर आपस में परस्पर का व्यवहार पूरा उपकार तथा अभिप्राय सिद्ध होना अत्यंत ही कठिन हो जाता है।

आर्य समाज की स्थापना:

महर्षि दयानंद सरस्वती जी जिन्हें आर्य समाज की स्थापना का पूरा श्रेय दिया जाता है। महर्षि दयानंद सरस्वती जी ने आर्य समाज की स्थापना चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को सन 1875 को मुंबई के गिरगाव में की थी। महर्षि दयानंद सरस्वती जी ने आर्य समाज की स्थापना इस प्रकार से की थी की आर्यसमाज के नियम तथा सिद्धांत किसी भी प्राणिमात्र के लिए क्षतिपूर्ण नही है।

आर्यसमाज की स्थापना करते समय उन्होंने प्रत्येक नियमो तथा सिद्धांतो को इस तरह से बनाया था की इससे भविष्य में किसी भी मानव को कोई भी समस्या नही होगी। महर्षि दयानंद सरस्वती जी के अनुसार आर्यसमाज का मुख्य उद्देश्य इस समाज का उपकार करना ही है। अर्थात प्रत्येक प्राणिमात्र का शारीरिक, आत्मिक तथा सामाजिक कल्याण करना ही है, वर्तमान में आर्यसमाज अपने सिद्धांतो पर अडिग है। इसकी प्रमुख वजह केवल महर्षि दयानंद सरस्वती जी के द्वारा दिए गये सही संस्कार तथा सिद्धांत ही है।

महर्षि दयानंद सरस्वती जी द्वारा किये गये समाज सुधार के कार्य:

महर्षि दयानंद सरस्वती जी ने इस समाज में अपना अमूल्य योगदान देकरहमें हमारे समाज और धर्म के देखने का नया नजरिया प्रदान किया है। उन्होंने अपने प्रयासों से समाज में व्याप्त बुराइयों तथा कुरीतियों जमकर विरोध करते हुए समाप्त भी किया।

  • महर्षि दयानंद सरस्वती जी ने तत्कालीन समाज में फैले अन्धविश्वासो, रुढ़िवादी सोच गलत सिद्धांतो का जमकर विरोध किया तथा उन्हें समाप्त किया था।
  • महर्षि दयानंद सरस्वती जी ने जन्मना जाती का जमकर विरोध किया तथा कर्म के आधार पर वर्ण निर्धारण की बात सभी के सामने रखी।
  • महर्षि दयानंद सरस्वती जी ने स्त्रियों की शिक्षा को लेकर भी आगे होकर प्रबल अभियान चलाया था।
  • महर्षि दयानंद सरस्वती जी ने बाल विवाह तथा बाल मजदूरी का बहुत अधिक विरोध किया तथा उन्होंने विधवा विवाह का आगे होकर समर्थन भी किया था जो की उस समय में बहुत अधिक मुश्किल था।
  • महर्षि दयानंद सरस्वती जी ने सभी धर्मशील अनुयायियों को एक मंच पर एकत्रित करते हुए समाज में एकता स्थापित करने के लिए बहुत प्रयास किये थे।
  • महर्षि दयानंद सरस्वती जी न्याय की व्यवस्था को ऋषि प्रणीत ग्रंथो के आधार पर किये जाने का समर्थन किया था।
  • उन्होंने समाज में फैली महिलाओ के प्रति फैली कुरीतियों का विरोध करते हुए तथा समाज में स्त्रियों की भागीदारी को मजबूत करने की बात समर्थन किया था।

महर्षि दयानंद सरस्वती जी द्वारा स्वराज्य का सन्देश:

हमारे समाज में तो महर्षि दयानंद सरस्वती जी को सिर्फ आर्यसमाज के संथापक तथा प्रभावी समाज सुधारक के रूप में ही जाना जाता है। लेकिन यह बात बहुत कम ही लोग जानते है की महर्षि दयानंद सरस्वती जी का राष्ट्रीय स्वतंत्रता के लिए किये गये प्रयत्नों में बहुत अहम् भूमिका रही है। उस समय केवल महर्षि दयानंद सरस्वती जी ने यह कहने का साहस किया था की आर्यावत सिर्फ और सिरी आर्यावार्तियो ( भारतीय लोगो ) का ही है।

जब हमारे देश में प्रथम स्वतंत्रता संग्राम 1857 हुआ था। तब इसकी सम्पूर्ण योजना भी महर्षि दयानंद सरस्वती जी के नेतृत्व में ही तैयार की गयी थी। महर्षि दयानंद सरस्वती जी ने ही स्वराज्य का सन्देश सभी को दिया था और जिसे बाद में बाल गंगाधर तिलक जी ने भी अपनाया था जिसके पश्चात उन्होंने कहा की स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है

महर्षि दयानंद सरस्वती जी की मृत्यु तथा अंतिम शब्द:

जिस महान व्यक्ति ने पूरे देश को बताया की परोपकार ही धर्म है और सिर्फ हमें निराकार ब्रम्ह में ही विश्वास करना चाहिए। जिन्होंने आर्यसमाज जैसे श्रेष्ठ समाज की स्थापना भी की थी। वो महर्षि दयानंद सरस्वती जी ही थे जिन्होंने 1857 के पहले स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अंग्रेजो से जमकर लोहा लिया तथा उनकी नीतियों का जमकर विरोध भी किया था।

कर्म को ही पूजा मानने तथा निराकार ब्रम्ह में विश्वास करने वाले महर्षि दयानंद सरस्वती जी की मृत्यु 30 अक्टूबर, 1883 को दीपावली के पावन दिन पर हुई थी। तत्पश्चात महर्षि दयानंद सरस्वती जी पंचतत्व में विलीन हो गये थे।

स्वामी दयानंद सरस्वती जी के अंतिम शब्द यह थे की कृण्वन्तो विश्वमार्यम् इसका हिंदी भाषा में अर्थ होता है की  “सारे संसार तथा समाज को एक श्रेष्ठ मानव तथा परोपकारी समाज बनाओ। तथा प्रभु! तूने अच्छी लीला की, आपकी इच्छा पूर्ण हो “यह शब्ह महर्षि दयानंद सरस्वती जी के अंतिम शब्द थे। आशा है की आपको Swami Dayananda Saraswati Biography In Hindi पर यह आर्टिकल अवश्य ही पसंद आया होगा।

 

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